भारत में न्याय की देवी की आंखों से हटी काली पट्टी, अब कानून ‘अंधा’ नहीं
नई दिल्ली, 16 अक्टूबर। अब तक आपने देखा की समस्त न्यायालयों में कानून की देवी की आखों पर काली पट्टी लगी रहती थी। जिसके चलते यह संज्ञा दी जाती थी की कानून की आखों पर तो पट्टी लगी यह अंधा कानून है। लेकिन अब यह लाइन इतिहास के पन्नों में कैद होती नजर आ रही है क्योंकि अब कानून देख सकता है। न्याय की देवी की आंखों से पट्टी उतर चुकी है। भारत में अब कानून ‘अंधा’ नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के जजों की लाइब्रेरी में न्याय की देवी की मूर्ति लगाई गई। इस मूर्ति में नई बात यह है कि पहले न्याय की देवी की मूर्ति में जहां एक हाथ में तराजू और दूसरे हाथ में तलवार होती थी और आंखों पर पट्टी होती थी, अब नए भारत की न्याय की देवी की आंखों की पट्टी खुल गई है। यहां तक कि उनके हाथ में तलवार की जगह संविधान आ गया है। देश में कुछ समय पहले अंग्रेजों के कानून बदले गए हैं। अब न्यायपालिका ने भी ब्रिटिश युग को पीछे छोड़ते हुए नया रंग-रूप अपनाना शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जजों की लाइब्रेरी में न्याय की देवी की मूर्ति लगाई गई। इसमें आंखों से पट्टी हटा दी गई है।
गौरतलब है कि इस तरह देश की सर्वोच्च अदालत ने यह संदेश दिया है कि अब ‘कानून अंधा’ नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के निर्देश पर न्याय की देवी की आंखों से पट्टी हटाई गई है और हाथ में तलवार की जगह संविधान को जगह दी गई है। मूर्ति के हाथ में तराजू का मतलब है कि न्याय की देवी फैसला लेने के लिए मामले के सबूतों और तथ्यों को तौलती है। तलवार का मतलब था कि न्याय तेज और अंतिम होगा। अभी तक न्याय की मूर्ति की आंखों पर पट्टी बंधी थी. एक हाथ में तराजू और दूसरे हाथ में तलवार थी। इससे जुड़ा मुहावरा सुर्खियों में रहता है कि ‘कानून अंधा होता है’। अदालतों में दिखने वाली मूर्ति को लेडी जस्टिस मूर्ति कहा जाता है। इस मूर्ति को मिस्र की देवी मात और ग्रीक देवी थेमिस के नाम से जाना जाता है।