धार्मिक नगरी बरमान की धर्मशालाओ पर बड़ा सवाल

*पंचायत को सौपी जायें बरमान की धर्मशालाएं*

शासन का पैसा मतलब जनता का पैसा, और सांसद विधायक निधि मतलब जनता की निधि।

नेता अपने और अपनों के लिए विकास कार्यों में खर्च निधि का उपयोग करते हैं असल में वह जनता के पैसे ही होते हैं जो सांसद व विधायक अपनी निधि से विकास कार्यों में खर्च करते हैं।

ऐसा ही विकास कुछ धार्मिक नगरी बरमान कलां में धर्मशालाओ के रूप में किया गया, जिसमें स्वर्णकार धर्मशाला में शादी विवाह व अन्य कार्यक्रमों के पैसे लिए जाते हैं पर ताजुब की बात यह है कि जनता के पैसों से बनी यह धर्मशाला में कुछ लोगों का वर्चस्व है जबकि कायदे से शासन के पैसों से बनी यह धर्मशालाये ग्राम पंचायत के हेंडओवर होना चाहिए । जोकि अब तक नहीं हुई है ।

वही गरीबों को भी अपनी बेटियों की शादी के लिए दस दस हजार धर्मशाला के संचालकों को देना होता है।

वही धर्मशाला के संचालक खुलकर अपना पक्ष रखने से कतरा रहे हैं ।

ग्रामीणों का भी कहना धर्मशालायें शासन प्रशासन के आधिपत्य में होना चाहिए ना कि किसी व्यक्ति विशेष के लोगों के कब्जे में ।