‘राजस्थानी भाषा’ में शपथ लेने से प्रोटेम स्पीकर ने रोका
राजस्थान, 3 अप्रैल। बुधवार से शुरू हुए 16वीं विधानसभा के पहले सत्र में नवनिर्वाचित विधायकों को शपथ दिलाई गई। शपथ ग्रहण के दौरान कुछ ऐसा हुआ जिससे राजस्थानी भाषा पर बहस शुरू हो गई। राजस्थान में नई सरकार के गठन की कवायद जारी है। मुख्यमंत्री, डिप्टी सीएम और स्पीकर का नाम तय हो चुका है। अब मंत्रिमंडल के लिए मंथन हो रहा है।
दरअसल, शपथ के दौरान कई विधायकों ने अलग-अलग भाषाओं में शपथ ली, जिनमें 22 विधायकों ने संस्कृत में शपथ ग्रहण की। दो विधायकों ने राजस्थानी भाषा में शपथ लेना चाहा, लेकिन प्रोटेम स्पीकर ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। वजह है- राजस्थानी भाषा का आधिकारिक नहीं होना। बाड़मेर की शिव विधानसभा से निर्दलीय विधायक रविंद्र सिंह भाटी और बीकानेर कोलायत से भाजपा के विधायक अंशुमान सिंह ने राजस्थानी में शपथ लेनी शुरू की थी, लेकिन स्पीकर ने दोनों को राजस्थानी भाषा में शपथ लेने से रोक दिया। हालांकि दोनों ही विधायकों ने पहले राजस्थानी और फिर हिंदी में शपथ पूरी की। राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलवाने की मांग कई सालों से चल रही है।
बुधवार को राजस्थान विधानसभा में हुए इस घटनाक्रम के बाद राजस्थानी भाषा को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। लोग कह रहे हैं कि अगर राजस्थान विधानसभा में राजस्थानी भाषा में शपथ नहीं हो सकती तो कहां होगी। हालांकि कुछ लोग इस बहस में राजस्थानी भाषा की स्पष्टता पर भी बात कर रहे हैं। क्योंकि राजस्थान के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग तरह की बोलियां बोली जाती हैं। इसलिए जिन विधायकों ने शपथ ली थी, उन्होंने राजस्थानी में नहीं बल्कि मारवाड़ी में शपथ लेने की कोशिश की, जिसे स्पीकर ने नकार दिया। प्रोटेम स्पीकर ने क्यों जताई आपत्ति।
भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची के आर्टिकल 344 (1) और 351 में 22 ऑफिशियल भाषाओं का जिक्र है। साल 1950 में 14 भाषाओं को आधिकारिक भाषा की सूची में डाला गया। उसके बाद 1967 में सिंधी और 1992 में चार भाषाओं कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली भाषाओं को भी आधिकारिक भाषा की सूची में शामिल किया गया। वहीं, आखिरी बार 2004 में चार भाषाओं बोडो, डोगरी, मैथिली और संथाली को भी आधिकारिक भाषाओं की लिस्ट में शामिल किया गया था।