अंतरिक्ष में भारत को एक और उपलब्धि
23 May — – आज भारत विश्व का एक ऐसा विकासशील राष्ट्र बन चुका है, जो विश्व के सर्वाधिक विकसित राष्ट्र रूस और अमेरिका की वैज्ञानिक शक्तियों एव महत्वों से प्रतिस्पर्धा करते जा रहा है। संसार में आज अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में जो होड़ लगी हुई है, उससे भारत तनिक भी पीछ नहीं है। वास्तव में भारत की अंतरिक्ष वैज्ञानिक प्रगति देखने योग्य है।भारत पहले ही ऐंटी-सैटलाइट (।ै।ज्) मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद अब अंतरिक्ष में दुश्मन के इरादों को चकनाचूर करने की क्षमता विकसित करने के कई अन्य विकल्पों पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।

मिशन शक्ति के सफल प्रदर्शन से भारत ।ै।ज् क्षमता वाले तीन देशों (अमेरिका, चीन और रूस) के एलिट क्लब में शामिल हो गया था। रिसैट-2बी सैटेलाइट के सफल प्रक्षेपण के साथ अंतरिक्ष में भारत की क्षमता का विस्तार सुखद प्रगति है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने श्रीहरिकोटा केंद्र से 615 किलोग्राम वजनी जिस सैटेलाइट का प्रक्षेपण किया है, वह भारत के आर्थिक और सामरिक विकास में बहुत मदद करने वाला है। इस अनिवार्य और दुर्लभ उपलब्धि के लिए इसरो के वैज्ञानिकों की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है।
यह अंतरिक्ष से धरती की इमेज या छवि-चित्र भेजने वाला सैटेलाइट है। इस विशेष सैटेलाइट का प्रक्षेपण भारत के लिए बहुत जरूरी हो गया था। वैसे दो इमेज सैटेलाइट भारत पहले अंतरिक्ष में भेज चुका है, लेकिन उनमें से रिसैट-1 वर्ष 2017 में ही काम करना बंद कर चुका है, जबकि रिसैट-2 प्रतिकूल मौसम या बादल होने पर इमेज भेजने में नाकाम रहता है। विशेषज्ञ बता रहे हैं, पाकिस्तान के बालाकोट में भारत की सर्जिकल स्ट्राइक के पुख्ता प्रमाण भारत सरकार पेश नहीं कर पाई, क्योंकि बालाकोट की सैटेलाइट इमेज बादल छाए होने के कारण नहीं ली जा सकी थी। अब रिसैट-2बी भारत की इस कमी को दूर कर देगा। यह सैटेलाइट रात में भी इमेज लेने में सक्षम है। साथ ही, बादल होने या प्रतिकूल मौसम होने पर भी यह बहुत साफ इमेज भेज सकता है। यह अंतरिक्ष में स्थापित भारत की विशेष आंख के रूप में काम करेगा।
भारत जिस तरह से अराजक और शत्रु तत्वों से घिरा हुआ है, जरूरी है कि अंतरिक्ष से उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जाए। भारत के विरुद्ध किसी तरह का सैन्य जमावड़ा होने की स्थिति में या भविष्य में कभी आतंकी शिविरों पर हमला करने में भारतीय सुरक्षा और रक्षा बलों को काफी सुविधा होगी। आतंकी शिविरों में मौजूद तत्वों के बीच यह भय होना ही चाहिए कि वे दिन-रात हर मौसम भारत की निगाह में हैं। रिसैट-2 में कुछ इजरायली यंत्र लगे थे, लेकिन रिसैट-2बी पूरी तरह से भारत की अपनी कामयाबी है। यह अपने आप में प्रशंसनीय है कि भारत 615 किलोग्राम के सैटेलाइट को प्रक्षेपित कर पृथ्वी से करीब 557 किलोमीटर ऊपर कक्षा में स्थापित करने की क्षमता वाला देश बन गया है। जबकि चीन के पास यह क्षमता है ही, पाकिस्तान भी लगभग इसी तरह का एक्स-बैंड रडार वाला सैटेलाइट चीन की मदद से पिछले वर्ष जुलाई में प्रक्षेपित करवा चुका है। भारतीय वैज्ञानिक बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने मात्र 15 महीने में पूरी तरह से भारतीय सैटेलाइट तैयार किया है, जो पांच वर्ष तक सक्रिय रहेगा। अब इस सैटेलाइट द्वारा भेजी गई इमेज का इस्तेमाल मौसम व अन्य भू-अध्ययनों में हो सकेगा। भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान की इस उपलब्धि के बाद अब पूरी दुनिया की निगाह चंद्रयान-2 पर है। रिसैट-2बी की सफलता के बाद यह घोषणा भी हो गई है कि 9 से 16 जुलाई के बीच चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण होगा और वह 6 सितंबर को चांद पर उतरेगा।
भारत से समय समय पर अंतरिक्ष में विज्ञान के अविष्कार के लिए छोड़े गए उपग्रह विश्व को चकित करने वाले रहे हैं। 19 मई, 1974 को राजस्थान के पोखरन क्षेत्र में भारत ने पहला परमाणु विस्फोट किया था। 19 अप्रैल 1995 को भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए सोवियत भूमि से आर्यभटृ नामक प्रथम उपग्रह को छोड़ा था। इसकी सफलता पर सारे संसार ने भारत की अंतरिक्ष अनुसंधान की महिमा स्वीकार की थी। यह आर्यभटृ नामक प्रथम उपग्रह 800 कि.ग्रा. वजन का था। 19 जून सन् 1981 में फ्रांस की भूमि से भारत ने पहला एप्पल छोड़ा था। एप्पल नामक उपग्रह अब भी अंतरिक्ष की परिक्रमा कर रहा है। 1 नवम्बर 1981 में छोड़ा गया भास्कर द्वितीय भी इसी क्रम में अनुसंधान कर रहा है। अहमदाबाद, मंगलूर, कोटा, तिरूवन और अन्तपुरम में अनेक भारतीय वैज्ञानिक अंतरिक्ष विज्ञान से सम्बन्धित अनुसंधान कार्य में संलग्न हैं। 16 अप्रैल 1983 को रोहिणी श्रृंखला का तीसरा उपग्रह 11 बजकर 13 मिनट और 7 सैकंड में पृथ्वी की कक्षा में पहुंच गया। उपग्रह-प्रक्षेषण वाहन एल.एल.बी.-3 के रोहिणी उपग्रह बी. 211 बजकर 6 मिनट पर श्री हरिकोटा से अंतरिक्ष में भेजा गया। 23 मीटर ऊँचा चार चरणों का यह राकेट नारंगी और सफेद रंग का धुआँ छोड़ते हुए ऊपर उठकर 1 मिनट 15 सैकण्ड बाद आँखों से ओझल हो गया। यह उपग्रह 17 टन वजन का था। इसका पता इलैक्ट्रोनिक्स के उपकरणों से तिरूवतन्तपुरम, श्री हरिकोटा और अहमदाबाद के केन्द्रों से लगाया जाने लगा। इस प्रकार भारत अंतरिक्ष विज्ञान की अनुसंधान प्रक्रिया में लगा हुआ है। सन् 1978 में भारत ने अमेरिकी फोर्ड एस्पेस एण्ड क्म्यूनिकेशन कारपोरेशन के साथ इन्सेट का निर्माण के लिए समझौता किया था। उसके परिणामस्वरूप 10 अप्रैल, 1982 मे अमेरिकी अंतरिक्ष केन्द्र से ‘इन्सेट-1ए’ अंतरिक्ष में स्थापित किया गया। इसका आधारभूत निर्माण और निरूपण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के वैज्ञानिकों ने किया था, लेकिन 150 दिन अंतरिक्ष में रहने के बाद जब यह समाप्त हो गया, तब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के वैज्ञानिक इससे निराश नहीं हुए और पुनः उत्साहित होकर अमेरिकी अंतरिक्ष यान चैलेंजर से बहुदेशीय और बहु आयामी उपग्रह इन्सेट 1बी को अंतरिक्ष में भेजने में सफल हो गए। इसी तरह 3 अप्रैल 1984 को सुप्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक राकेश शर्मा ने रूस के अंतरिक्ष यान में जाकर अंतरिक्ष में अभूतपूर्व अनुसंधान सम्बन्धित विज्ञान प्राप्त किए और प्रयोग भी किए। 29 अप्रैल 1983 को अमेरिका स्वेससीज-3 पर स्थित भारतीय उपग्रह अंतरिक्ष प्रयोगशाला ‘अनुराधा’ भी अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में विशेष विज्ञान प्राप्त किया। इससे वायुमंडल सम्बन्धी ऊर्जा, प्रकाश आदि का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त होता है। भारत का अंतरिक्ष यान इन्सेट 1सी 22 जुलाई, 1988 को फ्रेंच गुयाना के स्थान से एक विदेशी कम्पनी फोर्ड ए अरोस्पेष एण्ड क्म्युनिकेशन कारपोरेशन के द्वारा तैयार किया गया था । इस यान को यहीं से छोड़ा गया, लेकिन दुर्भाग्य का विषय रहा है कि इसमें कुछ खराबी आ गई। इसकी खराबी को दूर करके उसका उपयोग किया जा सकता है।
इस तरह हम देखते हैं कि भारत अंतरिक्ष अनुसंधान विज्ञान के क्षेत्र में निरन्तर कदम बढ़ता जा रहा है। भारत की यह प्रगति अब भी जारी है और भविष्य में भी जारी रहेगी। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान विज्ञान की प्रगति से भारतीय वैज्ञानिकों की अद्भुत प्रतिभा, साहस, धैर्य, क्षमता और जिज्ञासा की भावना प्रकट होती ही है। इसके साथ हमारे देश की वैज्ञानिक उपलब्ध्यिों का महत्व प्रकट होता है। इसके साथ ही साथ विश्व में भारत को अंतरिक्ष अंतरिक्ष अनुसंधान विज्ञान के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी भूमिका भी प्रस्तुत करती है। हमें अपने देश के इस अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अपूर्व योगदान देने वाले वैज्ञानिकों को पाकर अत्यन्त गर्व और स्वाभिमान होता है।