जब गुनहगार छूटते हैं और पीड़ित रह जाते हैं
2006 के मुंबई लोकल ट्रेन धमाकों में लगभग 189 लोगों की जान गई। लगभग 19 वर्षों तक चले मुकदमे के बाद जब उच्चतम न्यायालय ने सबूतों के अभाव में 12 अभियुक्तों को बरी कर दिया, तो यह न्याय व्यवस्था, जांच एजेंसियों और अभियोजन की निष्क्रियता पर गहरी चोट थी। कमजोर जांच, फॉरेंसिक लापरवाही, जबरन कबूलनामे और गवाहों की सुरक्षा की अनदेखी ने पूरे मामले को खोखला बना दिया। यह घटना हमें बताती है कि न्याय सुनिश्चित करने के लिए वैज्ञानिक, निष्पक्ष और जवाबदेह प्रणाली की आवश्यकता है। वरना जनता का भरोसा केवल व्यवस्था पर से ही नहीं, लोकतंत्र से भी उठ जाएगा।