दिमागी रेबीज यानी इंसान से दूरी, कुत्ते से करीबी
हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ लोग अपनी मां को वृद्धाश्रम छोड़ आते हैं, लेकिन कुत्तों के लिए मखमली बिस्तर खरीदते हैं। जहाँ बच्चे की फीस चुकाना कठिन होता है, पर पालतू जानवर के लिए सालगिरह पार्टी देना ‘प्यारा’ माना जाता है। यह वह युग है जहाँ संवेदना की दिशा बदली है, विस्तार नहीं हुआ। पशु-पक्षियों से प्रेम करना बुरा नहीं, परन्तु जब यही प्रेम इंसानों से दूरी और उपेक्षा में बदल जाए, तो यह मानसिक संतुलन की नहीं, मानसिक भ्रम की निशानी है।