मल्लिकार्जुन खड़गे ने शुभंकर सरकार को तत्काल प्रभाव से पश्चिम बंगाल कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया
22 सितंबर। लोकसभा चुनाव में हार के नतीजों का असर पश्चिम बंगाल में दिखायी दिया। यहां आज कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पांच बार के सांसद रहे अधीर रंजन चैधरी को हटाकर, शुभंकर सरकार को तत्काल प्रभाव से पश्चिम बंगाल कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया है। शुभंकर सरकार को अध्यक्ष बनाये जाने के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि बंगाल कांग्रेस का अब तृणमूल कांग्रेस का साथ रिश्ता कैसा होगा? शुभंकर सरकार को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने के बाद बंगाल की राजनीति के समीकरण पर सवाल उठने लगे हैं।
गौरतलब है कि प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद शुभंकर सरकार रविवार को प्रदेश कांग्रेस कार्यालय विधान भवन पहुंचें। कांग्रेस कार्यालय में प्रवेश करते ही कांग्रेस समर्थकों ने शुभंकर सरकार का फूल-मालाओं से स्वागत किया। इस अवसर पर शुभंकर सरकार ने पत्रकारों से चर्चा के दौरान कहा कि राज्य में तृणमूल कांग्रेस से ही उनका मुकाबला है। उन्होंने कहा कि मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, वणुगोपाल, सबने फैसले लिए, जिम्मेदारी दी. हम जननायक राहुल गांधी के फैसले को गंभीरता से लेंगे और प्रदेश की जनता की आशाओं और आकांक्षाओं को पूरा करेंगे। प्रदेश कांग्रेस को मजबूत और संगठित करने के लिए काम करेंगे।
शुभंकर ने कहा, ”मैंने कांग्रेस के हर नेतृत्व से बात की है। मुझे लगता है कि पश्चिम बंगाल के लोग कांग्रेस को चाहते हैं। पूर्व अध्यक्ष अधीर रंजन चैधरी, प्रदीप भट्टाचार्य अपने अनुभव से मेरा मार्गदर्शन करेंगे। मैं आने वाले दिनों में टीम को मजबूत करने की कोशिश करूंगा यही बड़ी बात है।”
लेकिन शुभंकर सरकार की नियुक्ति और अधीर चैधरी की विदाई ने कई सवाल छोड़ दिया है। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार पार्थ मुखोपाध्याय कहते हैं कि अधीर चैधरी पांच बार के सांसद रहे हैं। एक बयान जारी कर जिस तरह से उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। यह उनका अपमान है। उनका कहना है कि प्रदेश कांग्रेस की जिम्मेदारी एक ऐसे नेता को दी गई है, जिसने कभी एक चुनाव भी नहीं जीता है और अखिल भारतीय कांग्रेस के सचिव और बंगाल युवा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष के सिवा और कोई भी बड़ी जिम्मेदारी नहीं संभाली है और न ही बंगाल कांग्रेस में उनकी बहुत पकड़ है. ऐसे में शुभंकर सरकार नेमप्लेट में तब्दील हो चुकी कांग्रेस में क्या बदलाव ला पाएंगे या कांग्रेस के विभिन्न गुट उन्हें कितना स्वीकार कर पाएंगे। इसमें संदेह ही है।