यदि ‘लव’ है तो ‘जिहाद’ कैसा ?
‘लव जिहाद’ के खिलाफ उप्र और हरयाणा सरकार कानून बनाने की घोषणा कर रही है और ‘लव जिहाद’ के नए-नए मामले सामने आते जा रहे हैं। फरीदाबाद में निकिता तोमर की हत्या इसीलिए की गई बताई जाती है कि उसने हिंदू से मुसलमान बनने से मना कर दिया था। उसका मुसलमान प्रेमी उसे शादी के पहले मुसलमान बनने का आग्रह कर रहा था। यह शब्द लव-जिहाद 2009 में सामने आया, जब केरल और कर्नाटक के कैथोलिक ईसाइयों ने शोर मचाया कि उनकी लगभग 4000 बेटियों को प्रलोभन देकर या डराकर मुसलमान बना लिया गया है। एक-दो मामले उच्च और सर्वोच्च न्यायालय में भी चले गए। सरकारी जांच एजेंसियों ने भी तगड़ी छान-बीन की लेकिन हर मामले में लालच या डर या इस्लामिक षड़यंत्र नहीं पाया गया। किंतु जांच एजेन्सियों को ऐसे ठोस प्रमाण जरुर मिले कि कुछ इस्लामी संगठन बाकायदा धर्म-परिवर्तन (तगय्युर) की मुहिम चलाए हुए हैं और उनकी कोशिश होती है कि वे हिंदू, ईसाई, सिख आदि को इस्लामी जमात में शामिल कर लें। इस तरह की कोशिशें सिर्फ यहूदियों और पारसियों में ही कम से कम देखने में आती हैं, वरना कौनसा मजहब है, जो अपना संख्या-बल बढ़ाने की कोशिश नहीं करता ? वे ऐसा इसीलिए करते हैं, क्योंकि वे समझते है कि ईश्वर, अल्लाह या यहोवा को प्राप्त करने का उनका मार्ग ही एक मात्र मार्ग है और वही सर्वश्रेष्ठ है सिर्फ हिंदू धर्म के अनुयायी ही सारी दुनिया में एक मात्र ऐसे हैं, जो यह मानते हैं कि ‘एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।’ याने सत्य एक ही है लेकिन विद्वान उसे कई रुप में जानते हैं। इसीलिए भारत के हिंदू या बौद्ध या जैन या सिख लोगों ने धर्म-परिवर्तन के लिए कभी तन, तलवार या तिजोरी का सहारा नहीं लिया।