सरकारी और निजी स्कूलों के बीच खाई
निश्चित तौर पर देश की सरकार सरकारी और निजी स्कूलों के बीच गुणोत्तर दर से बढ़ रही खाई पाटने में असफल नजर आ रही है। ऐसे में शिक्षा के दोहरे स्तर ने समाज को दो भागों में विभक्त करने का काम किया है। अभिनेता इरफान खान की फिल्म ‘‘ हिन्दी मीडियम ‘‘ ने भारत में सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बीच के अंतर को बखूबी उजागर किया. लेकिन इस देश में सरकारी स्कूल प्राइवेट जितने ही अच्छे हैं। कान्वेट स्कूलों की मृग मरीचिका का आलम यह है कि राजधानी लखनऊ में कुकरमुत्तों की तरह खोले गए चोरी छिपे संचालित हो रहे निजी क्षेत्रों के 85 स्कूलों को बंद करने का नोटिस बीएसए द्वारा जारी किया गया।
जब राजधानी में यह संख्या 85 तो प्रदेश में 8500 और देश में 85000 होगी यानि कि इन चोरी छिपे संचालित हो रहे स्कूलों में अभिभावकों और छात्रों के भविष्य से सीधे धोखाधड़ी की जा रही है। भारत में सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में बड़ा अंतर देखने को मिलता है। क्लासरूम के हालात हों या टीचर के पढ़ाने का तरीका, हर चीज में फर्क साफ पता चलता है. ऐसे में कम आमदनी होने के बाद भी लोग भारी फीसों वाले प्राइवेट स्कूलों में ही अपने बच्चों को भेजना पसंद करते हैं. लेकिन जर्मनी में ऐसा नहीं है। यहां मात्र 9 फीसदी बच्चे ही प्राइवेट स्कूलों में जाते हैं। जाहिर है सरकारी और प्राइवेट की फीस में यहां भी बड़ा अंतर है. जहां सरकारी स्कूलों में बच्चे लगभग मुफ्त में पढ़ते हैं, वहीं प्राइवेट स्कूलों में कम से कम लाख रुपये की फीस लगती है। ऐसे में क्या भारत को जर्मनी की शिक्षा पद्धति का अनुसरण नही करना चाहिए। कोई भी वह राष्ट्र जो हर मामले में एक महाशक्ति बनने के बारे में सोच रहा है, उसे हमेशा एक पर्याप्त मजबूती की आवश्यकता होती है ताकि वह अपनी महत्वाकांक्षा को महसूस कर सके। इस शक्ति को प्राप्त करने के कई तरीके हैं जिनमें से एक तरीका शिक्षा है, जो हर किसी के लिए उपलब्ध होनी चाहिए। एक राष्ट्र के रुप में भारत ने इस संबंध में कुछ कदम उठाये हैं। भारत में 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को अनिवार्य मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती है। हालांकि, सवाल और समस्याएं शिक्षा की पहुँच पर नहीं बल्कि प्रदान की जा रही शिक्षा की गुणवत्ता पर हैं। एक उदाहरण और भी होगा कि भारत में निजी क्षेत्रों में अव्वल दर्ज के शिक्षक और विशेषज्ञों को लगभग अल्प वेतन में काम करते देखा जाता है। इसके बावजूद निजी क्षेत्रों के स्कूलों में कभी कभार शिक्षकों का विरोध प्रदर्शन नजर आता है। जबकि सरकारी शिक्षकों के आन्दोलन साल में कितने बार नजर आ जाए इसका कोई लेखा जोखा नही जबकि स्थिति यह कि सरकारी स्कूलों शिक्षकों का ज्ञान कई बार चैनलों के माध्यम से देखा जा चुका है कि उन्हें देश के राष्टपति को छोड़ दीजिए स्वंय के राज्यों के मुख्यमंत्री यहाॅ तक कि स्वंय के जिले के डीएम का नाम ज्ञात नही है।
भारत में दो प्रकार के स्कूल हैं जिनमें सरकार के स्वामित्व में या सरकार से सहायता प्राप्त तथा निजी स्वामित्व वाले स्कूल शामिल हैं। सरकारी स्कूल वास्तव में अधिक से अधिक लोगों को शिक्षा उपलब्ध करने का सराहनीय काम कर रहे हैं और आमतौर पर ये सरकारी स्कूल मुफ्त या मामूली शुल्क पर शिक्षा प्रदान कर रहे हैं जो वास्तव में सभी की पहुँच तक हैं। यह शहरी क्षेत्रों के लोगों के लिए बहुत मददगार हैं। जिनके लिए अपने बच्चों को अधिक महंगे निजी या सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों और ग्रामीण क्षेत्रों में ले जाना संभव नहीं होता है, शायद यही एकमात्र उपाय हैं जिनमें बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं और बेहतर भविष्य का सपना देख सकते है। हालांकि, इसके शुरुआत में कुछ समस्याएं हैं। सरकारी स्कूलों के छात्रों को प्रदान की गई शिक्षा और सुविधाओँ के उन मानकों के लिए नहीं जाना जाता है जो कि निजी (प्राइवेट) स्कूलों द्वारा उपलब्ध कराये जाते हैं। इसके अलावा, शिक्षा प्रारम्भ होने के कुछ सालों के बाद सरकारी स्कूलों को बर्बादी से संघर्ष करते हुए देखा जाता है। शायद इस घटना का मुख्य कारण भारत में शिक्षित युवाओं के लिए विशेष रुप से ग्रामीण क्षेत्रों में नौकरियों की कमी है। आखिरकार क्यों कोई पोस्ट ग्रेजुएट होना चाहता है और फिर नौकरी के बिना घर पर बैठना पसंद करता है? अगर कोई शिक्षित होने के बाद कामयाब रोजगार शुरु करना चाहता है तो उसे उस क्षेत्र में काम शुरू करना और अनुभव एकत्र करना होता है, ऐसी स्थिति में शिक्षा समय नष्ट करने का एक जरिया बन जाती है और यह एक बहुत ही चिंताजनक बात है।शायद यह एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ उठाये जाने वाले सवालों पर अधिकारियों को यह देखने की जरूरत है कि क्या ग्रामीण इलाकों में शिक्षा आंदोलन सफल हो रहा है। इसका कारण यह है कि कार्यबल की क्षमता और कौशल एक ऐसी चीज है जो किसी देश के भाग्य को बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है, भारत में इस बात पर कोई अपवाद नहीं है। दूसरा, सरकारी ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में सरकार शिक्षकों की नियुक्ति तो कर रही है लेकिन शिक्षक हमेशा समय पर रिपोर्ट नहीं करते हैं या स्कूल बिल्कुल भी नहीं आ रहे हैं, उनके वेतन का भुगतान भी नहीं किया जा रहा है, जो कि न्याय व्यवस्था का भयानक शोषण है। अगर शिक्षक स्कूल नहीं आ रहे तो छात्र भी इसकी सूचना नहीं देते हैं। दूसरी ओर, चूँकि छात्र कुछ पाठ्यक्रमों में पढ़ाई करने के लिए अपनी कक्षाएं छोड़ देते हैं, इससे निराश होकर शिक्षक स्कूल के साथ में उन बच्चों को भी छोड़ देते हैं जो कम सुविधाओं वाले स्कूलों में भी पढ़ सकते हैं। इस प्रकार पूरी शिक्षा प्रक्रिया को घाटे में पहुँचा दिया जाता है और शिक्षा मजाक का एक विषय बन जाती है।इसके अलावा शहरी क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था में अलग प्रकार की समस्याएं और पहलू हैं। शहरों और कस्बों में ऐसे निजी स्कूल हैं जो अपने छात्रों को अच्छी सुविधाएं प्रदान करते हैं और आदर्श रूप से उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार करते हैं। हालांकि, समस्या यह है कि उनकी फीस बहुत अधिक होती है जिसके कारण कई लोग इन स्कूलों तक नहीं पहुँच पाते हैं। यह स्कूल इस फीस को कम करने के लिए तैयार नहीं हैं क्योंकि छात्रों को प्रदान की जाने वाली उच्च सुविधाओँ की खरीद के लिए उनको अधिक पूँजी की आवश्यकता होती है। सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल भी ऐसी सुविधाएं प्रदान करते हैं और वे अपने क्षेत्र के आर्थिक रूप से पिछड़े बच्चों के लिए उच्च सुविधाओँ से सुसज्जित होते हैं। लेकिन ऐसा सभी सरकारी स्कूलों के बारे में नहीं कहा जा सकता है। सरकारी स्कूलों में देश के 60 प्रतिशत बच्चे पढ़ते हैं। मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान न दिए जाने के कारण इन स्कूलों की साख और स्वीकार्यता लगातार घटी है।प्रो जगमोहन सिंह राजपूत। राष्ट्र की सर्वांगीण सर्व-समेकित प्रगति का आधार उसकी शिक्षा की गुणवत्ता, स्वीकार्यता, गतिशीलता और उपयोगिता के स्तंभों पर टिका होता है। इसकी प्राथमिकताएंय किसे पढ़ायें, क्या पढ़ायें, कैसे पढ़ायें, और कौन पढ़ाये की परिधि में निर्धारित होती हैं। बच्चे, पाठ्यक्रम,विधा और अध्यापक इसके मुख्य कारक हैं जिनके लिए समाज और राष्ट्र शिक्षा व्यवस्था का निर्माण और संचालन करते है। शिक्षा नीति तथा स्कूल शिक्षा के पाठ्यक्रम 1992 तथा 2005 में बने थे, इनमें त्वरित परिवर्तन की आवश्यकता है। 2005 में बनी पुस्तकें 2020 में स्वीकार्य नहीं हो सकती हैं।सरकारी स्कूलों में देश के 60 प्रतिशत बच्चे पढ़ते हैं। मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान न दिए जाने के कारण इन स्कूलों की साख और स्वीकार्यता लगातार घटी है। लिहाजा निजी स्कूलों की तरफ लगातार बढ़ रही दौड़ प्रारम्भ हुई है। इस अंतर को कम करने के प्रयास प्रारंभ होने ही चाहिए।देश में स्कूल अध्यापकों की सेवा-पूर्व-प्रशिक्षण की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। उसकी नकेल धंधे बाजों के हाथ में चली गई है। 93 फीसद शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान निजी हाथों में चाले गए हैं। इस अस्वीकार्य स्थिति से मुक्ति दिलाना आवश्यक है। सरकारों को बड़े पैमाने पर अपने प्रशिक्षण संस्थान खोलने चाहिए। अध्यापकों की नियमित नियुक्तियों का न होना, और अनेक राज्यों में प्रक्रिया में अनावश्यक देरी के कारण अत्यंत निराशा का वातावरण बना है, प्रतिभावान युवा इससे दूर हो रहे हैं। इस पर राष्ट्रव्यापी परियोजना बनाकर नियत समयअवधि में सुधार करना होगा।विश्वविद्यालयों में भी नियुक्तियों को लेकर स्थिति अत्यंत विकट है, इसे गति देने के लिए यदि आवश्यक हो तो नियुक्ति प्रक्रिया में उचित संशोधन करना वांछित होगा। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नियामक संस्थाओं की साख अत्यंत नीचे के स्तर पर पहुंच चुकी है। ऐसी स्थिति में केन्द्र और राज्यों की सरकारों का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह सरकारी और निजी क्षेत्रों के बीच बढ़ रही खाई को दूर करें।